शिक्षक दिवस पर

 Greetings on the Teachers Day friends 🙏🔏

"ज्ञान शिलाओं पर लिखा लेख नहीं है उस लेख की व्याख्या व अर्थ की जीवन संधि है"

A heap of broken images come to my mind as I look at the Day. What do we celebrate the zipped mouths or the ripped persona. The teaching is not a level playing field with wide variety of students having strange inclinations, intelligence, backgrounds etc and connections (latest entrant). However, a great teacher knows that perfectionism kills creativity so sometimes omits a lot to let the originality pour out. We are all the poems that our teachers inspired us to write with a belief that one day we'll interpret & unfold ourselves beautifully before the World. 

There is a big boom in the 'knowledge', percolating through every known medium, not essentially authentic, that in their cacophony the real knowledge is patiently waiting to be heard. There is so much we might know, that we perhaps ought to know, that it’s often easiest just to act as if we do. To overcome knowingness, we need a humbler and more curious stance to growing information boom. The challenge is how to live with the knowledge that what steers us one way or another, toward terror or tenderness, can be the faintest and most random ripple in the surface of consciousness.

On the lighter side: Today on the occasion of Teacher’s Day, I contacted some of my school teachers and said whatever I am today is all because of them......

They said, 'Don't blame us, we tried our best'.

मेरे मित्र जो कि शिक्षक हैं से कल बात हुई तो उन्हें गुमसुम पाया, कुरेदा तो कहने लगे कि पढ़ाना अब पटरियों पर चलने जैसा हो गया है कभी भी किसी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. अगर हूं हां में जवाब देते हैं तो मुखर हो गये छात्र कहने लगते हैं सर बेझिझक कहिये कोई रेकौर्डिंग नहीं कर रहा. तब हर पल अपने को कटघरे में खड़ा अनुभव पाते हैं जहां छात्र जज हो गये हैं. भावशून्य हो अध्यापन निश्चय ही अत्यधिक कठिन हो गया है, ये कौन सी अदृश्य लक्ष्मण रेखा है जो घेरे हुए है

अब जब कि भारत विश्व गुरु बनने की कगार पर है, शिक्षक गण अपने विलुप्त होते महत्व को विस्मय से देख रहे हैं. 'बड़ी कठिन है डगर पनघट की कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी'. अब तो यह हाल है एक अध्यापक का कि 'मैं निकला गड्डी लेके रस्ते में....... इक मोड़ आया ... मैं ओथे गड्डी छोड़ आया' पर चैन की सांस तब भी नहीं ले सकता जब तक की सांस बाकी है और वहीं नौकरी करने की आस बाकी है

ज्ञान के इस अपार सैलाब में डूब रहा है जीवन इसी में डूबने उतरने की सलाह दी जाती है. पर करें क्या, 'जो लोग ज्यादा जानते हैं इंसां को कम पहचानते हैं' 

प्रस्तुत है इक कविता कुछ व्यंग्य लिए - 'अ से अनाड़ी से ज्ञ से


ज्ञानी'


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